Friday, 16 December 2016

सीखे हैं सबक हमने .........

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

रूठे हैं जो क़िस्मत के तारों के बहाने से
वो मान भी जाएँगे थोड़ा सा मनाने से

तन्हाई से घबरा के निकले थे सुकूँ पाने
गम ले के चले आए ख़ुशियों के घराने से

सीता तो हुई रुसवा ,मीरा को विष, अब भी
कृष्णा ये कहे ठहरो ! बाज़ आओ सताने से

सागर के सीने में एक आग भी होती है
भड़के तो कहाँ साथी ! बुझती है बुझाने से

हारेंगे न बैठेंगे कोई लाख जतन कर ले
सीखे हैं सबक़ हमने उस्ताद ज़माने से !

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(चित्र गूगल से साभार)